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आंदोलन कर रहे किसानों की सबसे प्रमुख मांग है न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी। by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब हालांकि जानकारों का कहना है कि मात्र इसी से किसानों का दर्द दूर नहीं होगा। एमएसपी के अलावा सार्वजनिक संग्रह प्रणाली, पब्लिक प्रोक्योरमेंट सिस्टम (पीपीएस) और कृषि उत्पादों की समय से खरीद भी जरूरी है।अगर इनमें से किसी एक को भी अलग कर दिया जाए तो पूरे ढांचे का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यानी एमएसपी, मंडियां और पीपीएस तीनों होगी तभी लाभ मिलेगा।70 के दशक में एमएसपी और सार्वजनिक संग्रह प्रणाली पीपीएस सबसे अधिक फायदा धान, गेहूं पैदा करने वाले किसानों को मिला। आज के दौर में एमएसपी और पीपीएस का उद्देश्य दोहरा है।पहला फसलों में रोग जलवायु परिवर्तन और सूखे से उपजी परिस्थितियों में खाद्यान्न आत्मनिर्भरता।दूसरा किसानों की एक आय सुनिश्चित करना। दूसरा उद्देश्य पूरा करना इसीलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि 86 प्रतिशत किसान परिवार या तो मार्जिनल (1 हेक्टेयर से कम जोत वाले) या छोटी जोत (एक से 2 हेक्टेयर जोत वाले) हैं जिनका अपने कृषि उत्पाद तुरंत बेचना मजबूरी होती है।क्या है एमएसपी?अगर कभी कई फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है। तब भी केंद्र सरकार तथा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके। किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है। कृषि मंत्रालय के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की अनुशंसा के आधार पर एमएसपी तय होता है।एमएसपी का हर फसल को क्यों नहीं मिलता लाभ?सरकार 23 फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है। लेकिन इस पर मुख्यत दो ही फसलों की होती है। जैसे मक्के का भाव 2019-2020 में 1760 रुपए प्रति क्विंटल था। बिहार में किसानों को बाजार में औसत मूल्य 1250 रुपये प्रति क्विंंटल का मिला। हरियाणा में 1000 से 1200 रुपये प्रति क्विंंटल ही मिला।मंडियों का जाल बिछाना होगाअनाज संग्रह करने के लिए दो चीजें जरूरी हैं। पहला मंडियों का जाल, जैसे पंजाब में हर 20 किलोमीटर पर एक मंडी है अभी 7000 एपीएमसी मंडिया हैं। अगर हर 5 किलोमीटर पर मंडी बनानी होगी तो 40000 मंडियों की जरूरत होगी। दूसरा एमएसपी को 23 फसलों के लिए कानूनी बाध्य बनाना है। पूरे देश में कोई गुंजाइश ही नहीं होगी कि कोई व्यापारी उसके नीचे खरीद कर सके। - वनिता पंजाब कृषि विशेषज्ञऐसे तय होता है एमएसपी?एमएसपी का आकलन करने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग खेती की लागत को तीन भागों में बांटता है।ए2, ए2 + एफ एल और सी2। अभी फसल की लागत पर जो एमएसपी तय किया जा रहा है वह ए2+ एफएल है।ए2+ एफएल: उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नकदी खर्च जैसे बीज, खाद ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है।नकद खर्च के साथ पारिवारिक श्रम यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है।सी2: खेतों के व्यवसायिक मॉडल को अपनाया जाता है। इसमें कुल नगद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रमिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है।,

The most important demand of agitating farmers is the guarantee of minimum support price i.e. MSP. by social worker Vanita Kasani Punjab However, experts say that only this will not relieve the pain of the farmers. Apart from MSP, timely procurement of public collection system, public procurement system (PPS) and agricultural products is also necessary. If any one of these are excluded, then the entire structure will have no meaning. That is, MSP, Mandis and PPS will be available only if there are three benefits. MSP and public collection system PPS benefited most of the paddy, wheat-producing farmers in the 70s. In today's era, the objective of MSP and PPS is dual. Disease in first crops and food self-sufficiency under conditions arising from drought. Second, to ensure an income of farmers. It is also challenging to fulfill the second objective because 86 percent of the farming families are either marginal (holding less than 1 hectare) or small holdings (holding one to 2 hectares) who are forced to sell their agricultural produce immediately. What is MSP? If ever the price of many crops falls according to the market. Even then, the Central Government buys the crop from the farmers at the fixed minimum support price so that the farmers can be saved from loss. The MSP of a crop is the same across the country. The MSP is decided based on the recommendation of the Commission for Agricultural Costs and Prices (CACP) under the Ministry of Agriculture. Why don't every crop of MSP benefit? The government declares MSP for 23 crops. But on this there are mainly two crops. For example, the price of maize was Rs 1760 per quintal in 2019-2020. Farmers in Bihar got an average price of Rs 1250 per quintal in the market. In Haryana, it was only 1000 to 1200 rupees per quintal. Mandis have to be laid Two things are necessary for grain collection. The first mandi network, like Punjab has a mandi every 20 km. There are currently 7000 APMC mandis. If mandi has to be made every 5 km, then 400 mandis will be required. The second is to make MSP legally bound for 23 crops. There will be no scope in the whole country that any trader can buy below it. - Vanita Punjab Agricultural Specialist How is MSP decided? For estimating MSP, the Commission for Agricultural Costs and Prices divides the cost of farming into three parts. A2, A2 + FL and C2. The MSP that is currently being decided on the cost of the crop is A2 + FL. A2+ FL: All kind of cash expenses incurred by farmers for production like seeds, compost fuel and irrigation etc. are included. Estimated wages of the peasant family are also added to the family labor i.e. crop production cost along with the cash expenditure. C2: Business model of farms is adopted. This includes the total cash cost and family remuneration of the farmer, plus the rent of the farmland and interest on the total agricultural capital.,

http://baluwana.blogspot.com/2021/01/the-most-important-demand-of-agitating.html,

🙏🙏🙏#किसान भाईयों आज मैं आप को यह किसान #आंदोलन क्यों हो रहा है और इस आंदोलन से देश में सामाजिक,धार्मिक व राजनीतिक में क्या क्या बदलाव होंगे । इस पर कुछ बताना चाहती हूं ।1. पहली बात आप को बता दूं कि #केंद्र_सरकार द्वारा लाये गये यह तीनों कृषि बिल असंवैधानिक है।2. #संविधान में तीन सूची का उल्लेख है पहली संघ सूची,दूसरी राज्य सूची और तीसरी समवर्ती सूची।3. #कृषि राज्य सूची में आता है।कृषि पर कानून बनाने का केंद्र को अधिकार ही नहीं है।यह मैं नहीं कह रहा हूँ। संविधान की समझ रखने वाले सभी अधिकारी व वकील कहते हैं।यह अलग बात है कि जब संविधान को कोई माने ही नहीं वो कुछ भी कर सकता है।4. #कृषि_कानून किसानों के हित में नहीं है यह बात सरकार ने भी स्वीकार की है।अगर यह कृषि कानून किसान के हित में होते तो तीनों कानूनों में 15 पॉइंट में से सरकार 10 पॉइंट सरकार बदलने की बात नहीं करती।15 में से 10 पॉइंट सरकार बदलने को तैयार है इसका मतलब कानून गलत बन गय ।5. जब #कानून गलत बन गये और किसान विरोध कर रहे हैं उसके बावजूद सरकार कानून वापस क्यों नहीं ले रही है इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है मोदी की छवि खराब होने का डर ।6. #देश की जनता अब विचार करें कि लाखों किसानों को बर्बाद करके एक व्यक्ति की छवि बरकरार रखनी है या लाखों किसानों को बचाना हैं।एक व्यक्ति की छवि बचाना चाहते हो तो तीनों कृषि कानूनों का समर्थन कर सकते हो और देश के किसानों को बचाना चाहते हो तो किसानों का साथ दो ।7. #कृषि कानून किसानों का डेथ वारंट है,किसान ठंड,बरसात में 45 दिन से सड़कों पर बैठे हैं। यह सब पता होने के बाद भी कोई किसानों के साथ नहीं है तो वो निश्चित रूप में निर्दयी,क्रूर,अत्याचारी, अधर्मी, देशद्रोही है और ऐसे लोगों की जनता पहचान कर रही है।इतिहास में उनका नाम गद्दारों की लिस्ट में लिखा जायेगा ।8. इस आंदोलन से देश मे बदलाव क्या क्या हो रहे हैं यह भी समझने की जरूरत है।10. सबसे बड़ा बदलाव तो यह हुआ कि इस आंदोलन से पूरा देश एक हो गया यानि "संयुक्त किसान मोर्चे" के झंडे नीचे आ गया ।10.(1)दूसरी बात धर्म,जाति, भाषा व प्रान्त की सभी दीवारे ढह गई। सभी धर्मों के किसान,मजदूर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं ।10. (2)तीसरी बात 2014 के बाद मोदी जी के खिलाफ बोलने वालों को जो लोग देशद्रोही का प्रमाण पत्र बांट रहे थे आज उनके देशभक्ति के प्रमाण पत्र के लाले पड़ रहे हैं । खुद ने ही साबित कर दिया कि देश के सबसे बड़े देशद्रोही हम ही हैं।10. (3)चौथी बात किसानों की एकता इतनी मजबूत है कि मीडिया किसानों की बाईट व आंदोलन के कवरेज को तरस रहा है।आजादी के बाद पटलकारों कि इतनी बेइज्जती कभी नहीं हुई। ऐसे पत्रकारों को आंदोलन के बाद जुत खाने का भी डर सता रहा है।11. 2014 के बाद मोदी जी का चहेरा पहलीबार फक पड़ा हैं,भाषणों में लटके झटके भूल गये।किसानों के डर के कारण बोलते बोलते भूलने लगे है।"बाई कहता रांड" आने का मतलब है कि घबराहट बहुत ज्यादा है।12. दुनियाँ मोदी जी मुठ्ठी में है कहने वालों को उस समय जोरदार झटका लगा जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ने 26 जनवरी के आतिथ्य को ठुकरा कर किसानों के साथ खड़े होने का संदेश दिया। 13. #सिक्खों के #त्याग,#सेवाभाव,#बहादुरी व #दिलेरी के आगे सब नतमस्तक है । एक इंसान को दूसरे #इंसान_की_मदद कैसे करनी चाहिये यह सिक्खों से सीखनी चाहिये।14. इस आंदोलन से देश की जनता को धर्म व धंधे में फर्क समझ आ गया। जो अन्नदाता के साथ खड़ा था वही धर्म है और जो अन्नदाता के खिलाफ खड़ा था वो धंधा है।15. #किसानआंदोलन2020 के #दर्द को इस समय कोई समझ नहीं सकता उसे जल्दी ही किसी मनोचिकित्सक से अपनी जांच करवानी चाहिये।🙏🙏🙏साथियों किसानों का साथ दो और देशभक्त होने का फर्ज अदा करो। गद्दार तो सभी किसानों का विरोध कर रहे हैं।,,

#आंदोलन और #मोदी_सरकार एक खास तरीका अपनाया है शुरू से ही इस मोदी सरकार ने आंदोलनों से निपटने के लिए, ध्यान देंगे तो वो समझ मे आ ही जायेगा।इस देश की जनता कोई भी आंदोलन करे पहले तुरंत उसपर रिएक्शन मत दो, प्रधानमंत्री चुप रहते हैं। आंदोलन की धार देखी जाती है, उसे परखा जाता है और फिर उनकी अपनी रणनीति लागू की जाती है.....पहला .... उसे चलने दिया जाए बिना किसी रिएक्शन के और #थकने दिया जाए...दूसरा ..... उनका पेड सोशल मीडिया टीम उस आंदोलन को बदनाम करने के पॉइंट्स #गढ़ते हैं, और #देशद्रोही जैसे कोई भी टैग चिपकाने की बेहया कोशिश चालू हो जाती है।तीसरा .... खुद कुछ करने का #नाटक शुरू किया जाता है, कोई भी समझदार इंसान इनकी नियत को बड़े ही आराम से समझ सकता है।चौथा .... जब मोदी सरकार को समझ मे ये आने लगता है कि आम जनता का समर्थन भी मिलने लगा तो लेके आती है अब #अदालत को बीच मे। अदालत से अपने मनमाफिक आदेश, कमेटी बना के अपना खेल आगे बढ़ा दिया जाता है।ये पैटर्न अब सबको समझ मे आ ही गया है। इसलिए अबकी इस #किसान_आंदोलन में उनकी चालें कामयाब हो नही पा रहीं।,

किसानो को क़र्ज़े से मुक्ती पानी होगी.व अपना हर रू अपनी जेब से नक़द खरच करना होगा.ज्यादा मजबूरी है तो बैंक से लोन लेना ही ठीक है.करीब हर किसान उधार लेकर घी पीता है व भारी ब्याज चुकाता है.यह कैसी नासमझी है!कुछ भी उधार लेने पर उसे महँगे दाम पर समान ख़रीदना पड़ता है. by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब,

कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों ने दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड निकालने का एलान किया है। by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब यह परेड भले ही 26 जनवरी को निका गाली जाएगी और किसानों से 23 जनवरी तक पहुंचने का आह्वान किया गया हो, लेकिन किसानों ने पहले ही दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचना शुरू कर दिया है।पंजाब व हरियाणा से लगातार ट्रैक्टर-ट्राली व अन्य वाहनों में किसान पहुंचने लगे हैं और दो दिन में करीब दस हजार किसान पंजाब व हरियाणा से पहुंच चुके हैं जिसको देखते हुए किसान नेताओं ने अकेले पंजाब व हरियाणा से अगले दस दिन में एक लाख किसानों के दिल्ली की सीमा पर पहुंचने का दावा किया है। हालांकि किसान नेताओं का कहना है कि वह देशभर के किसानों को बुलाने में जुटे हैं, लेकिन हरियाणा, पंजाब, यूपी, राजस्थान नजदीक होने के कारण इनपर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।कृषि कानूनों के खिलाफ किसान करीब 50 दिन से आंदोलन कर रहे है और वह दिल्ली की सीमाओं पर ठंड के बावजूद सड़क पर डेरा डालकर बैठे हुए हैं। इस बीच सरकार से किसानों की लगातार बातचीत हो रही है, लेकिन उसके बावजूद कोई हल नहीं निकल सका है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि सरकार व किसानों के बीच चल रहा गतिरोध कुछ कम होगा।यह उम्मीद भी मंगलवार को खत्म हो गई, जब किसानों ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी आंदोलन जारी रखने का एलान कर दिया। जिसके साथ ही गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसान परेड में शामिल होने के लिए किसानों ने हुंकार भरनी शुरू कर दी है।पंजाब व हरियाणा के किसान ट्रैक्टर-ट्राली समेत अन्य वाहनों में दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचने शुरू हो गए हैं। अकेले कुंडली बॉर्डर पर दो दिन में करीब दस हजार किसान पहुंच गए हैं, जबकि पंजाब व हरियाणा से किसान के जत्थे आने का सिलसिला लगातार जारी है। इसके साथ ही किसानों ने हरियाणा, पंजाब, यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड में जागरूकता अभियान चलाया हुआ है। जिससे इन सभी राज्यों से ज्यादा से ज्यादा किसानों को गणतंत्र दिवस परेड से पहले दिल्ली की सीमाओं पर बुलाया जा सके।ट्रैक्टर-ट्राली व वाहनों पर किसान संगठनों के साथ ही तिरंगा झंडा लगाकर चल रहेकिसानों के ट्रैक्टर-ट्राली व अन्य वाहनों पर जहां अभी तक केवल उनके संगठनों के झंडे रहते थे। वहीं अब उनके अंदर देशभक्ति का जज्बा भी पूरा देखने को मिल रहा है। अब दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचने वाले किसानों के ट्रैक्टर-ट्राली व अन्य वाहनों पर तिरंगे झंडे ज्यादा लगाए जा रहे है तो किसान संगठनों के झंडे कम हो गए हैं। गणतंत्र दिवस पर किसान परेड निकालने के समय उनको तिरंगा अन्य जगह से नहीं लाना पड़े, इसलिए पहले ही उसे अपने वाहनों पर लगाकर यहां पहुंचने की बात कही जा रही है।किसानों का आंदोलन उस समय तक जारी रहेगा, जबतक कृषि कानूनों को रद्द नहीं कर दिया जाता है। किसानों का ट्रैक्टर मार्च के बाद गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसान परेड निकालना ही बड़ा कार्यक्रम है और उसके लिए देशभर से किसान यहां पहुंचेंगे। हालांकि किसानों को 23 जनवरी तक पहुंचने के लिए कहा गया था, लेकिन उसके बावजूद किसानों ने अभी से दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचना शुरू कर दिया है। अभी पंजाब व हरियाणा के किसान ज्यादा पहुंच रहे है और यूपी, राजस्थान व अन्य राज्यों से किसान भी धीरे-धीरे आ रहे हैं। गणतंत्र दिवस से पहले यहां एक लाख से ज्यादा किसान पहुंच जाएंगे।-दर्शनपाल, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चाकृषि कानून रद्द कराने के लिए किसानों का आंदोलन जारी रहेगा और इसके लिए जिस तरह की रणनीति बनाई जा रही है, उसके तहत आंदोलन को बढ़ाया जा रहा है। गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसान परेड निकालने के लिए किसान सीमाओं पर पहुंचने शुरू हो गए है। सभी राज्यों से ट्रैक्टर-ट्राली में किसान आने शुरू हो गए है और इस तरह लग रहा है कि गणतंत्र दिवस से पहले एक लाख से ज्यादा किसान यहां पहुंच जाएंगे। किसान अपना हक लेकर रहेगा और वह पीछे हटने वाला नहीं है।-बलबीर सिंह राजेवाल, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा,,,

*समस्त शहरवासियो को लोहड़ी और मकर संक्राति की हार्दिक शुभकामनाएं ll**ईश्वर से यही कामना है कि आने वाला प्रत्येक नया दिन आपके जीवन में अनेकानेक सफलताएँ एवं अपार खुशियाँ लेकर आए ll**इस अवसर पर ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह वैभव, ऐश्वर्य, उन्नति, प्रगति, आदर्श, स्वास्थ्य, प्रसिद्धि और समृद्धि के साथ साथ आजीवन आपको जीवन पथ पर गतिमान रखे ll**समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब* 🌹🙏🙏🌹,

किसान नेता राकेश aazad #किसान_एकता #किसान_आंदोलन #जय_जवान_जय_किसान,

टिटहरी की चीखों से ट्रेक्टर नहीं रुका करते।यह तो किसान की इंसानियत होती है कि अंडों के इर्द-गिर्द आधा बीघा जमीन खाली छोड़ देता है।इसको वकील अपने पे ले या मी लार्ड,क्या फर्क पड़ता है!किसानों के बच्चे तो रोडसाइड बैठकर ही शिक्षा प्राप्त कर लेते है चाहे तुम फसल मारने का धंधा करो या नश्ल।स्कूलें मारी जा सकती है किसानों के बच्चों का हौंसला व समझ नहीं। By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब किसान_एकता_जिंदाबाद,

रसोई चलावे,सरकार बणावेंजहाज उड़ावेट्रैक्टर-कार दौड़ावेबात जब हक पे आवे,म्हारी दिलेर दादी, ताई-काकीसाथ खड़ी मैदान भी पावे#सैल्यूट,

किसान आंदोलन ट्रेक्टर मार्च के ये नजारे अद्भुत एवं अविश्वसनीय हैं#farmersprotest#kisanektazindabaad,

बुजुर्गों के जोश के आगे कड़ाके की ठंड ने भी घुटने टेक दिए तो सरकार क्या चीज है #जय_जवान_जय_किसान,