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हिंदुस्तान मेंआलू की खेती कैसे करें, यहां जानें By वनिता कासनियां पंजाब Potato farming: सब्जियों का राजा है आलू। गरीब हो अमीर आलू खाए बिना शायद ही किसी का ऐसा दिन बीता हो। आलू रबी सीजन की प्रमुख फसलों में से एक है। आलू को अकालनाशक फसल भी कहते हैं।आपको बता दें, उत्पादन के मामले में आलू की फसल की उपज क्षमता दूसरे फसलों से ज्यादा है। भारत में आलू की खेती (aloo ki kheti) सबसे अधिक उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश राज्य में होती है। अधिक उपज के कारण आलू की खेती (Potato farming) किसानों की पहली पसंद है।आलू (Potato) एक ऐसी फसल है जो बढ़ती आबादी को कुपोषण और भूखमरी से बचाने में सहायक है। यह पोषक तत्वों से भरपूर सब्जी होती है। इसमें 14 प्रतिशत स्टार्च, 2 प्रतिशत शक्कर, 2 प्रतिशत प्रोटीन और 1 प्रतिशत खनिज लवण होता है। 0.1 प्रतिशत वसा और कुछ मात्रा में विटामिन्स भी होता है।आलू की मांग को देखते हुए इसके उत्पादन को बढ़ाने की और अधिक जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि आलू की परम्परागत खेती की बजाय आलू की वैज्ञानिक खेती की जाए।तो आइए, द रुरल इंडिया के इस लेख में आलू की खेती कैसे करें (aaloo ki kheti kaise kare) जानें।आलू की खेती के लिए भूमि एवं जलवायुआलू की खेती के लिए समतल और मध्यम ऊंचाई वाले खेत ज्यादा उपयुक्त होते हैं। साथ ही अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी और बलुई दोमट मिट्टी जिसकी पीएच मान 5.5 से 5.7 के बीच हो। आलू की खेती (aaloo ki kheti) के लिए रबी अर्थात् ठंड की मौसम उपयुक्त है। इसके लिए दिन का तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस और रात का तापमान 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तक होनी चाहिए। वहीं कंद बनने के समय 20 से 25 डिग्री सेल्सियस ज्यादा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इससे ज्यादा तापमान होने पर कंदों का विकास रूक जाता है।खेती की तैयारी कैसे करेंखेत की तैयारी की बात करें तो मिट्टी के प्रकार के अनुसार खेत को 3-4 जुताई करें।जहां तक संभव हो खेती की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद की जुताई देसी हल से करें।प्रत्येक जुताई के बाद पाटा जरूर चलाएं ताकि मिट्टी भुरभूरी और खेत समतल हो जाए। इससे आलू के कंदो के विकास में आसानी होती है।आलू की बुआई का समयआलू की बुआई का समय इसकी किस्म पर भी निर्भर करता है। इसकी अच्छी उपज को लिए सितम्बर से अंतिम सप्ताह से नवंबर से प्रथम सप्ताह तक का समय उपयुक्त माना गया है।बीज का चयन करते समय रखे जाने वाले सावधानियांकिसानों के लिए किस्मों का चयन महत्वपूर्ण है। आलू के बीजों का चयन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।बीज हमेशा किसी विश्वसनीय स्रोत जैसे- सरकारी बीज भंडार, राज्य के कृषि और उद्यान विभाग, राष्ट्रीय बीज निगम, कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र या क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र से ही खरीदें।इसके अलावा आप खुद के उत्पादित बीज या प्रगतिशील किसान किसान से खरीदा हुआ बीज का प्रयोग करते हैं तो प्रत्येक 3 से 4 साल बाद बीज को जरूर बदल दें। बीज के किस्मों का चयन आप बाजार में मांग एवं जलवायु के अनुसार कर सकते हैं।Potato farming : आलू की खेती कैसे करेंआलू के किस्मों का चयनयदि आप अगेती किस्म लगाना चाहते हैं तो इसके लिए कुफरी पुखराज या कुफरी अशोका का चयन कर सकते हैं। आपको बता दें, ये किस्में 80 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 200 से 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक होती है।मध्यम किस्मों के लिए राजेन्द्र आलू-1, राजेंद्र आलू-2 राजेन्द्र आलू-3 और कुफरी कंचन जैसी किस्मों का चयन कर सकते हैं। आपको बता दें, ये किस्में 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 200 कुंतल प्रति हेक्टेयर 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक होती है।पछेती किस्मों के लिए आप कुफरी सुंदरी, कुफरी अलंकार, कुफरी सफेद, कुफरी चमत्कार, कुफरी देवा और कुफरी किसान जैसी किस्मों का चयन कर सकते हैं। ये किस्में 120 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 250 से 350 कुंतल प्रति हेक्टयर तक होती है।यदि आप आलू से चिप्स बनाना चाहते हैं तो इसके लिए भी विशेष किस्मों का विकास किया गया है। जैसे- कुफरी चिप्ससोना-1, कुफरी चिप्ससोना-2, कुफरी चिप्ससोना-3 और कुफरी आनन्द। ये सभी किस्में 100-110 दिनों में तैयार हो जाती है। जिसका औसत उत्पादन प्रति हेक्टेयर 300 से 350 कुंतल तक हो जाता है।बीजों का चुनाव और तैयारीकिसान भाइयों को बीजों का चुनाव करते समय बीज का आकार पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।बीज की गोलाई 2.5 से 4 सेंटीमीटर और वजन 25 से 40 ग्राम होना चाहिए। इससे कम या अधिक भार का बीज आर्थिक दृष्टि से भी उपयुक्त नहीं होती है क्योंकि अधिक बड़े आलू लगाने से किसानों का अधिक खर्च होता है जबकि कम आकार की बीज बोने से उपज में कमी आती है।आलू लगाने से 15 से 30 दिन पहले उसे बोरे से निकाल कर ऐसे कमरे के फर्श पर फैला दें जहाँ धुँधली रोशनी आती हो।ध्यान रखें कि जिस कमरे में आलू का बीज रखा जाए वह हवादार हो, ऐसा करने से बीज का अंकुरण जल्दी होता है। जिससे न सिर्फ पौधों की बढ़वार अच्छी होती है, बल्कि प्रति पौधे तना भी अधिक निकलते हैं।अंकुरित करने के लिए रखे गए बीज को हर दूसरे दिन निरीक्षण करना चाहिए और सड़े-गले आलू को निकाल देना चाहिए।इस बात का भी ध्यान रखें कि जिस बीज के कमजोर और पतले कंद और आँख हो उसे भी निकाल देना चाहिए। ऐसे कंद बीमारी से जल्दी ग्रसित होते हैं।अंकुरित बीज खेत तक ले जाने के लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है क्योंकि इस दौरान कंद की आँखे टूट सकती है।आलू के बीजों का उपचार कैसे करेंआलू को बोने से पहले बीजोपचार जरूरी है क्योंकि इससे फसल में बीमारी का प्रकोप नहीं हो। बीज उपचार करने से उत्पादन क्षमता में भी वृद्धि हो जाती है। बीज उपचार के लिए आलू के कंद को एक ग्राम कॉर्बनडाजिन या मैनकोजिब या कॉर्बोक्सिन दो ग्राम प्रति लीटर की पानी में घोल बना कर बीज को उपचारित करें। इस दौरान इस बात का भी ध्यान रखें कि उपचारित बीज को 24 घंटे के अंदर बुआई कर दें।आलू की बुआई विधिआलू की बुआई अन्य फसलों या सब्जियों की बुआई से एकदम अलग होती है।आलू की बुआई करते समय कतार से कतार और पौधा से पौधा की दूरी और गहराई का भी ख्याल रखें।आलू कम गहराई पर बोने से सूख जाते हैं जबकि अधिक गहराई पर बोने से नमी की अधिकता के कारण बीज सड़ जाते हैं।आलू की बुआई करते समय कतार से कतार 50 से 60 सेंटीमीटर और पौधा से पौधा 15 से 20 सेंटीमीटर की दूरी रखें।पछेती किस्मों में पौधों का विकास अधिक होती है। अतः इन किस्मों की बुआई 60 से 70 सेंटीमीटर और पौधा से पौधा दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर रखा जाता है।अब बात करते हैं आलू की बुआई विधि की जिसमें किसान अपनी सुविधानुसार चुन सकते हैं।आलू की बुआई विधि में सबसे सरल और पहली विधि है समतल भूमि में आलू बोकर मिट्टी चढ़ाना।इस विधि में खेती में 60 सेंटीमीटर पर लाइन बना ली जाती है और इन बनी हुई लाइन पर 5 सेंटीमीटर का गढ्ढा बनाकर आलू के कंद को 15 से 20 सेंटीमीटर की दूरी पर बुआई की जाती है। इसके बाद इसपर मिट्टी चढ़ा दी जाती है।दूसरी विधि है- मेड़ों पर आलू की बुआई करना। इसके लिए सबसे पहले कुदाल या अन्य मशीनों से मेड़ बनाकर उस पर उचित दूरी और गहराई पर आलू की बीज को लगा सकते हैं। यह विधि अधिक नमी वाले जमीन के लिए उचित है।निराई-गुड़ाईआलू की बुआई के 20 से 25 दिन बाद खरपतवारों को हटा दें, इस दौरान आलू पर मिट्टी पर कुछ मिट्टी चढ़ाकर नालियों को व्यवस्थित कर सकते हैं।खाद और उर्वरक प्रबंधनकिसान भाइयों अब बात करते हैं आलू की फसल में खाद एवं पोषण देने की। आपको बता दें, आलू की फसल जमीन की ऊपरी सतह से ही भोजन प्राप्त करती है इसलिए इसे प्रचुर मात्रा में जैविक और रासायनिक खाद की आवश्यकता होती है। इसके लिए इसकी बुआई के से पहले ही 250 से 300 कुंतल सड़ी गोबर की खाद या 40 से 50 कुंतल वर्मी कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग कर जुताई करें।इसके अलावा खेत की उर्वरता के अनुसार 120 से 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलो फॉस्फोरस और 100 से 120 किलोग्राम पोटॉश प्रति हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है। रासायनिक खाद कभी भी आलू की कंद को सीधे नहीं दी जानी चाहिए अन्यथा कंद सड़ या खराब हो सकती है।सिंचाई प्रबंधनआलू की खेती (Aloo ki kheti) के लिए पानी की आवश्यकता कम होती है। पहली सिंचाई आलू की फसल में 10-20 दिनों के भीतर कर देनी चाहिए। इसके बाद 10-15 दिन के अंतराल में थोड़ी-थोड़ी सिंचाई करते रहने चाहिए। सिंचाई के दौरान इस बात का ख्याल रखें कि मेड़ 2 से 3 इंच से ज्यादा नहीं डूबे।रोग नियंत्रण एवं फसल सुरक्षाआलू की फसल में हानिकारक कीट एवं रोग का भी प्रकोप होता है अतः किसान भाइयों को इसका भी ख्याल रखें।आलू में लगने वाले प्रमुख रोग हैं।-अगेती झुलसा और पछेती झुलसा इससे बचने के लिए इंडोफिल एम-45 या रीडोमिल का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं। कृषि वैज्ञानिकों इस रोग से बचने के लिए प्रत्येक 15 दिन पर इन दवाओं का छिड़काव का भी सलाह देते हैं।यदि कीटों की बात करें आलू की फसल में मुख्य रूप में लाही कीट का प्रकोप देखा गया है। इससे बचाव के लिए इमिडाक्लोरपिड का 1 मिली लीटर प्रति 3 लीटर पानी में मिलाकर छिड़ाकाव करें।आलू की खुदाई/कटाईआलू की फसल में जमीन के अंदर होती है आलू की कटाई की जगह पर किसानों को इसकी खुदाई करनी पड़ती है। अतः किसानों को फसल पकने के 15 दिन पहले ही सिंचाई बंद कर देनी चाहिए और आलू की खुदाई से पहले पत्तियों को 5 से 10 दिन पहले काट देनी चाहिए। इससे आलू की त्वचा मजबूत हो जाती है।आलू की खुदाई के बाद आलू को 3 से 4 दिन के लिए किसी छायेदार जगह पर ही रखें ताकि छिलके और भी मजबूत हो जाएं और आलू में लगी मिट्टी भी सूखकर अगल हो जाए।आलू की भंडारण और मार्केटिंगयदि आप आलू को फसल का सही दाम मिलने पर बेचना चाहते हैं तो इसके लिए आपको भंडारण की आवश्यकता होती है। कुछ समय के लिए आप अपने घर पर ही आलू पतली सतह लगाकर रख सकते हैं, लेकिन ज्यादा समय के लिए भंडारण के लिए आप शीत गोदामों में ही रखें। ताकि समय पर आलू निकासी कर उसे बाजार में बेच सकें।वनिता कासनियां पंजाबइस प्रकार आप आलू की वैज्ञानिक खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

1977 में #डीज़ल_का रेट लगभग 1रु 50 #पैसे था जोकि लगभग 100 गुना बढ़कर 102 रु ओर वही #गेहू का रेट औसतन 80 से 100 #रु #किवंटल था जो कि सिर्फ 19 गुना बढ़ा है बोलो किसान का भला कैसे हो सकता हैंबाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम की टीम#संगरिया #किसान #पुत्र

किसान का अनाज सड़को पर पड़ा ह ये सरकार कितनी नक्मी ह देश आज भी भूखा पड़ा ह

1977 में #डीज़ल_का रेट लगभग 1रु 50 #पैसे था जोकि लगभग 100 गुना बढ़कर 102 रु ओर वही #गेहू का रेट औसतन 80 से 100 #रु #किवंटल था जो कि सिर्फ 19 गुना बढ़ा है बोलो किसान का भला कैसे हो सकता हैंबाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम की टीम#संगरिया #किसान #पुत्र

A new way of spreading rumours.Central government abolished OBC quotaDue to which there was a loss of 10,000 seats.Now listen to the real math.Total MBBS Seats in India – 83075Total Government MBBS Seats in India - 41388in government seat

कपूर के पौधे के क्या फायदे हैं? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब कपूर का पौधा हमारे लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। इसकी सुगंध इतनी अच्छी होती है कि इसकी सुगंध से आसपास की सभी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती हैं। कपूर का पौधा अपनी सुगंध से चारों ओर के वातावरण को खुशबूदार बना देता है।कपूर के पौधे को हम अपने घर में,बाहर, कहीं भी किसी भी जगह पर लगा सकते हैं।इसे हम अपने घर में, गमले में,कहीं भी लगा सकते हैं। कपूर का पौधा केवल एक पौधा ही नहीं है अपितु यह हमारे लिए स्वास्थ्य रूपी खजाने का भंडार है।परंतु आज हम जानेंगे कपूर के पौधे के क्या फायदे हैं?कपूर का पौधा लगाने से घर से बीमारियां दूर हो जाती हैं। अगर कोई व्यक्ति कपूर के पौधे के संपर्क में रहता है तो वह हमेशा स्वस्थ रहता है।कपूर का पौधा लगाने से मक्खी, मच्छर ,सांप, छिपकली इत्यादि घर में नहीं आते हैं।सबसे बड़ा फायदा कपूर का पौधा लगाने से जो हमें होता है वह यह है कि यह पर्यावरण को शुद्ध करने में बहुत बड़ी मदद करता है।दोस्तों इस तरह से कपूर का पौधा हमारे लिए बहुत ही लाभकारी है।यह हमें जीवन वायु प्रदान करता है।अगर आप लोगों को यह जानकारी अच्छी लगी हो तो कृपया अपवोट जरूर करें।धन्यवाद

One plant of the world's sweetest fruit earns 12000 rupees at a time, the cost is also very lessBy philanthropist Vnita Kasniya PunjabThis plant starts giving yield after two years. aging of the plant

तेलंगाना के किसान ने उगाए बिना पकाए खाने वाले चावल- Magic riceBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबTelangana farmers is growing Magic riceकुछ सालों में खेती लोगों का जनुन बन चुका है। हमारे देश में ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं, जो लाखों की नौकरी छोड़ खेती का मार्ग चुन रहे हैं। आज हम एक ऐसे किसान की बात करेंगे, जिसने अपनी अकलमंदी और अपनी मेहनत से ख़ास किस्म के ‘मैजिक राइस’ (Magic rice) की खोज की है। इसके बारे में जानकार आप भी हैरान हो जाएंगे।मैजिक राइस (Magic rice)Sponsored LinksYou May Also LikeIndian Students: Study in CanadaCanada Scholarshipsby Taboolaकिसान श्रीकांत गरमपल्ली (Srikanth Garampally) करीमनगर के श्रीराममल्लापल्ली गाँव के रहने वाले हैं। उन्होंने एक अलग ख़ास किस्म के चावल की खोज की है। इस चावल की सबसे खास बात यह है कि इसे खाने के लिए पकाने की जरूरत नहीं होती है। इस चावल को केवल 30 मिनट के लिए पानी में भिगो देने के बाद यह खाने के लिए तैयार हो जाता है। अगर आप गरम चावल खाना चाहते हैं, तो इसे गर्म पानी में भी भिगो सकते हैं।Telangana farmers is growing Magic riceअसम से मिली Magic rice की जानकारीआमतौर पर इसे सामान्य पानी में भिगोकर भी आप आसानी से इस चावल को खा सकते हैं। इस चावल को रेडी-टू-ईट भी कहा जाता है। यह चावल बनाने में किसी भी तरह की कोई मेहनत नहीं लगती। श्रीकांत बताते हैं कि 1 साल पहले वह असम (Assam) गए थे। इस दौरान श्रीकांत को ऐसे चावल की जानकारी मिली, जिसे बिना पकाए खाया जा सकता है। उसके बाद श्रीकांत ‘गुवाहाटी विश्वविद्यालय’ से संपर्क करके चावल की इस अनुठी प्रजाति के पूरी जानकारी ली।Telangana farmers is growing Magic riceबाल वनिता महिला आश्रमअसम में पाए जाते हैं Magic riceश्रीकांत बताते हैं कि असम के पहाड़ी इलाक़ों में कुछ जनजातियां एक अलग क़िस्म के धान की खेती करते हैं। यह धान लगभग 145 दिनों में तैयार हो जाता है, जिसे पकाने तक की ज़रूरत नहीं पड़ती। असम के पहाड़ी इलाक़ों में इस चावल को ‘बोकासौल’ कहा जाता है। यह चावल सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इस चावल में 10.73% फ़ाइबर और 6.8% प्रोटीन पाए जाते हैं। इस चावल को असम के पहाड़ी लोग गुड़, केला और दही के साथ खाना ज्यादा पसंद करते हैं।Telangana farmers is growing Magic riceअसम से लाए चावल की बीजश्रीकांत बताते हैं कि जब वह असम गए थे, तब वही से इस ख़ास क़िस्म के चावल के बीज लेकर आए थे।ज्ञअहम राजवंश (Aham Raajavansh), जो 12वीं शताब्दी में असम के राजा हुआ करते थे। उन्हें ‘बोकासौल’ चावल बहुत पसंद था, लेकिन बाद में चावल की दूसरी प्रजातियों का मांग बढ़ने के चलते यह प्रजाति लगभग खतम ही हो गई थी। इसके बाद उन्होंने इस चावल को विकसित करने का फ़ैसला किया।Magic rice से हो रहा अधिक लाभश्रीकांत पिछले 30 सालों से खेती कर रहे हैं। Magic rice के साथ-साथ उनके पास और भी 120 किस्म के चावल का संग्रह हैं। उन चावलों का नाम नवारा, मप्पीलै, सांबा और कुस्का है। इसके अलावा श्रीकांत 60 अन्य प्रकार के जैविक सब्जियों की भी खेती करते हैं। श्रीकांत असम से धान के बीज लाने के बाद अपने आधा एकड़ खेत में बो दिए। केवल आधे एकड़ जमीन में उन्हें क़रीब 5 बोरी चावल का उत्पादन हुआ। धान की अन्य प्रजातियों के बराबर ही इसकी फ़सल भी 145 दिनों में तैयार हो जाती है।

सोलर सिस्टम की मदद से फूलों की खेती और लाखों-करोड़ों में कमाई, काफी चर्चित हो रहा है यह तरीका By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब फूलों के बाग की मालकिन बताती हैं कि उन्हें सोलर सिस्टम से काफी मदद मिल रही हैं और अब वे अपने फार्म के विस्तार के बारे में सोच रही हैं. उनका कहना है कि आने वाले समय में हम अपने इस्तेमाल के लिए 100 प्रतिशत ऊर्जा सौर बिजली से हासिल करना चाहते हैं.बाल वनिता महिला आश्रम authorUntitled Design 2021 02 05t121619.353सांकेतिक तस्वीरबदलते दौर में खेती के तौर-तरीकों में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. आज के समय में खेती के कामों में बड़े स्तर पर टेक्नोलॉजी और मशीन का प्रभाव दिखता है. टेक्नोलॉजी और मशीन की मदद से खेती का काम आसान तो हुआ है लेकिन लागत भी बढ़ गई है. बावजूद इसके यह नए समय की खेती के लिए जरूरत है.नए तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर केन्या के किसान आज फूलों की खेती कर रहे हैं और काफी अधिक लाभ कमा रहे हैं. दरअसल, बड़े पैमाने पर फूलों की खेती करने वाली कंपनियों के पास कोल्ड स्टोरेज हैं. वे फूलों को लंबे वक्त तक सुरक्षित रखने के लिए इनका इस्तेमाल करती हैं, लेकिन इसके लिए निर्बाध बिजली सप्लाई की जरूरत होती है. केन्या में बिजली की सप्लाई पर हमेशा भरोसा नहीं किया जा सकता. यहां अक्सर बिजली चली जाती है. ऐसे में कोल्ड स्टोरेज का इस्तेमाल करने वालों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. इसी में से एक ग्रेस न्याचाए भी हैं. वे काफी समय से इस समस्या का समाधान खोज रही थीं.कोल्ड स्टोरेज में लगती है काफी बिजलीडीडब्ल्यू हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रेस न्याचाए फूलों के एक फार्म की मालकिन हैं. सिंबी रोजेज नाम का उनका फूलों का बड़ा बाग केन्या की राजधानी नैरोबी के पास ठीका शहर में स्थित है. फेयर ट्रेड के सर्टिफाइट उनके फार्म में 500 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं. करीब 30 हेक्टेयर जमीन में बने ग्रीन हाउस गुलाब से भरे पड़े हैं. इन सारे फूलों को बिना किसी रसायन की मदद से उगाया जाता है. एक बार जब फसल तैयार हो जाए तो गुलाबों को पैक कर कोल्ड स्टोरेज में रख दिया जाता है. कोल्ड स्टोरेज और आर्टिफिशियल लाइट में काफी बिजली खर्च होती है.ग्रेस न्याचाए को कुछ हद तक इस मामले में सफलता मिल चुकी है. पिछले साल उन्हें एक सोलर सिस्टम मिला, जिससे 150 किलो वाट बिजली पैदा की जा सकती है. इसके लिए जर्मन स्टार्टअप इकोलिगो ने फंड की व्यवस्था की थी. ग्रेस न्याचाए कहती हैं, उन्होंने आकर हमें सोलर एनर्जी के फायदों के बारे में जानकारी दी. इसके साथ ही उन्होंने यह भी दिखाया कि थोड़ी सी कोशिश से हम यह शुरू कर सकते हैं और आधी ऊर्जा सोलर एनर्जी से हासिल कर सकते हैं.‘सोलर सिस्टम से मिली है काफी मदद’अब ग्रेस हर महीने 2400 यूरो उस स्टार्टअप को देती हैं. यह पैसा बहुत ज्यादा है लेकिन जितना वो पहले बिजली के लिए देती थीं, उससे 30 प्रतिशत कम है. 9 सालों में सारा पैसा चुकाने के बाद सोलर सिस्टम उनका हो जाएगा और उन्हें सिर्फ रखरखाव का खर्च ही उठाना पड़ेगा.सिंबी रोजेज की मालकिन ग्रेस न्याचाए कहती हैं कि उन्हें सोलर सिस्टम से काफी मदद मिल रही हैं और अब वे अपने फार्म के विस्तार के बारे में सोच रही हैं. उनका कहना है कि आने वाले समय में हम अपने इस्तेमाल के लिए 100 प्रतिशत ऊर्जा सौर बिजली से हासिल करना चाहते हैं.सोलर सिस्टम की वजह से उन्हें काफी लाभ मिल रहा है. लागत में कमी आई है. इसके साथ ही उन्हें अब यह नहीं सोचना पड़ता कि बिजली चली गई तो कोल्ड स्टोरेज में फूल सुरक्षित कैसे रहेंगे?इकोलिगो ने सिर्फ सिंबी रोजेज की मदद ही नहीं की है. केन्या में फूल का व्यापार करने वाली अन्य कंपनियों ने भी इकोलिगो की मदद से अपने लिए सोलर सिस्टम लगवाया है. जर्मन कंपनी इकोलिगो पारंपरिक ऊर्जा स्रोत पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम करती है और फंड के व्यवस्था कराने का तरीका भी इस कंपनी का शानदार है.कंपनी बैंक से फंड की व्यवस्था नहीं कराती बल्कि निजी निवेशकों, दोस्तों, परिवार वालों या अन्य इसी तरह के लोगों से धन लेकर सोलर सिस्टम लगाने में कंपनियों की मदद करती है. इस तरीके से धन जुटाने के पीछे कंपनी का मकसद है कि काम तेजी से हो जाए और लोगों को ज्यादा परेशानी न हो.